---------------------------------------------------------------------------------

इस सामूहिक ब्लॉग पर पोस्ट लगाने से पूर्व यह देख लें कि पिछली रचना को लगे अभी कितना समय हुआ है। ध्यान रहे कि प्रत्येक रचनाकार की पोस्ट कम से कम 24 घण्टे
तो [हमारा अतीत] के शीर्ष पटल पर चमकनी ही चाहिए।
इस मंच का रचनाकार बनने के लिये kuldeepsingpinku@gmail.com पर संपर्क करें।

कॉपीराइट नोट

[हमारा अतीत] पर प्रकाशित रचनाओं के सर्वाधिकार इन रचनाओ के रचनाकारों
के पास ही सुर्क्षित हैं, इस ब्लौग पर रचना, रचनाकार के नाम के साथ ही प्रकाशित की जाती है। साथ ही पुनः प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जाता है। यदि किसी भी कारण से किसी रचनाकार अथवा उनकी रचनाओं के प्रकाशकों
को इस पर आपत्ति हो, तो कृपया
kuldeepsingpinku@gmail.com
पर सूचित करें, इसे तुरंत हटा दिया जाएगा...
निवेदन

[मंच के रचनाकारों से भी मेरा निवेदन है कि रचना, उसके रचनाकार के नाम के साथ ही प्रकाशित होनी चाहिये। स्वयं की रचना किसी भी प्रकार से प्रकाशित की जा सकती है।
सामग्री का चयन करते समय रचनाकार अपनी समझ विवेक एवं ज्ञान का उपयोग करे, ताकि इस ब्लौग पर प्रकाशित रचनाएं आने वाली पीढ़ी के लिये मार्गदर्शक साबित हो सके।
हमारा देश धर्म निरपेक्ष देश है। धर्म निरपेक्षता ही हमारे देश की वास्तविक ताकत है। हमारा यह ब्लॉग भारत के गौरवमय इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने तथा आने वाली पीढ़ी में राष्ट्र प्रेम की अलख जगाने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया है, देश की अखंडता को खंडित करने के लिये नहीं।




रविवार, 25 जून 2017

मूर्ति पूजा का रहस्य सुविचार

मूर्ती पूजा का रहस्य जरूर पढ़े :-

कोई कहे की की हिन्दू मूर्ती पूजा क्यों
करते हैं तो उन्हें बता दें
मूर्ती पूजा का रहस्य :-

स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने
अपने भवन में बुलाया और बोला,

“तुम हिन्दू लोग मूर्ती की पूजा करते हो!
मिट्टी, पीतल, पत्थर की मूर्ती का.!

पर मैं ये सब नही मानता।
ये तो केवल एक पदार्थ है।”

उस राजा के सिंहासन के पीछे
किसी आदमी की तस्वीर लगी थी।

विवेकानंद जी कि नजर उस
तस्वीर पर पड़ी।

विवेकानंद जी ने राजा से पूछा,
“राजा जी, ये तस्वीर किसकी है?”

राजा बोला, “मेरे पिताजी की।”

स्वामी जी बोले, “उस तस्वीर को अपने
हाथ में लीजिये।”

राज तस्वीर को हाथ मे ले लेता है।

स्वामी जी राजा से : “अब आप उस
तस्वीर पर थूकिए!”

राजा : “ये आप क्या बोल रहे हैं
स्वामी जी.?

“स्वामी जी : “मैंने कहा उस
तस्वीर पर थूकिए..!”

राजा (क्रोध से) : “स्वामी जी, आप होश मे
तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।”

स्वामी जी बोले, “क्यों?

ये तस्वीर तो केवल
एक कागज का टुकड़ा है,
और जिस पर कूछ रंग लगा है।

इसमे ना तो जान है,

ना आवाज,

ना तो ये सुन सकता है,

और ना ही कूछ बोल सकता है।”

और स्वामी जी बोलते गए,

“इसमें ना ही हड्डी है और ना प्राण।

फिर भी आप इस पर कभी थूक
नही सकते।

क्योंकि आप इसमे अपने
पिता का स्वरूप देखते हो।

और आप इस तस्वीर का अनादर
करना अपने पिता का अनादर करना
ही समझते हो।”

थोड़े मौन के बाद स्वामी जी आगे कहाँ,
“वैसे ही, हम हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी,
या धातु की पूजा भगवान का स्वरूप मान
कर करते हैं।

भगवान तो कण-कण मे है, पर
एक आधार मानने के लिए और
मन को एकाग्र करने के
लिए हम मूर्ती पूजा करते हैं।”

स्वामी जी की बात सुनकर राजा ने
स्वामी जी के चरणों में गिर कर
क्षमा माँगी।

||°°अच्छा लगे तो शेयर करें !!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

रचना आप को कैसी लगी? अवश्य बताएं...
हमारा देश धर्म निरपेक्ष देश है। धर्म निरपेक्षता ही हमारे देश की वास्तविक ताकत है। हमारा यह ब्लॉग भारत के गौरवमय इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने तथा आने वाली
पीढ़ी में राष्ट्र प्रेम की अलख जगाने के उद्देश्य से प्रारंभ किया गया है, देश की अखंडता को खंडित करने के लिये नहीं।

इस लिये आप की टिप्पणी में किसी भी प्रकार के विवादित शब्दों का उपयोग नहीं होना चाहिये...हमारे गौरवमयी इतिहास के इस ब्लौग को नफरत और कट्टरपंथी चश्मों से बिलकुल न देखा जाए...